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18.11.10

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तेरा मुझसे साथ सदियों से





तेरा मुझसे साथ सदियों से, 
ये बंधन लगता कोई पुराना है।

एक दिन तुम भी शायद लौट आओ,
ये मेरा भरम लगता कोई पुराना है।

शायद हो, ये नासमझी का काम,
इस आग से परवाने का 
रिश्ता लगता कोई पुराना है।


दिल भर आया तो छलक पड़ी बुँदे,
इन बूंदों का आखो से,
रिश्ता लगता कोई पुराना है।

बन जाती है नश्तर अक्सर,
यादों में रात भर जागने का, 
मुझे शौक लगता कोई पुराना है।

अब रहने दो समझने समझाने की बातें,
बे गैरत रहने का,
मुझे रोग लगता कोई पुराना है। 

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रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
3 Comments
3 टिप्पणियां:
  1. बन जाती हैं नश्तर अक्सर.......
    बिलकुल सच बातें कह दी आपने कविता में

    उत्तर देंहटाएं
  2. अरविन्द जांगिड जी
    नमस्कार !
    बहुत खूब
    कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह पहली बार पढ़ा आपको बहुत अच्छा लगा.

    उत्तर देंहटाएं

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