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19.4.12

तेरे नाम के दो आंसू तो संभाले हूँ

10 टिप्पणियां



शिकायत  तुझसे अब रही तो नहीं,
तेरी लकीर हाथों से गुजरी तो नहीं।
तेरे नाम के दो आंसू तो संभाले  हूँ,
आज  मेरे घर  कोई कमी तो नहीं।
आँखों  में है तेरे भी ये घुटन कैसी,
कुछ तो है बात  जो कही तो नहीं।
"सच" कैसे पहचाने कोई नसीब को,
चेहरों की उसके यहाँ कमी तो नहीं।

18.4.12

तुम्हारी सविता

5 टिप्पणियां

ऑफिस से लौटने पर विपिन ने देखा कि सविता कमरे में नहीं थी।
"माँ.....सविता कहा है? "
"बेटा अब तुम्हे क्या बताऊ.....मैंने तुम्हे बहुत समझाया.....मगर तुम नहीं माने। रोज-रोज गड़े मुर्दे उखाडने में लगे रहते थे.....ये सही नहीं था। सविता तो पाँच बजे वाली बस से अपने पिताजी के साथ गाँव चली गयी है। उसे भी खूब समझाया लेकिन मेरी सुनता कौन है इस घर में और हाँ....तेरे लिए एक कागज छोड़ गयी है....ले। बेटा, मेरे नसीब में तो चारों तरफ ठोकर ही ठोकर लिखी हैं, तेरे पिताजी तो चले गए....आज मुझे ये दिन देखने पड़ रहे हैं। तू समझता तो अच्छा था। तू ही बता जब लोग बहु के बारे में पूछेंगे तो मैं क्या कहूँगी......।"  तकिये के नीचे रखा कागज थमाते हुए माँ की आवाज कुछ भर आई थी।

विपिन निढाल होकर कागज पढ़ने लगा......
"विपिन, ना जाने तुम कब समझोगे कि मैं तुम्हे कितना प्यार करती हूँ। तुम नेक दिल और सच्चे इंसान हो, मगर जानते हो तुम्हारी सबसे बड़ी कमजोरी क्या है, तुम्हारी कमजोरी है "शक"। तुम किसी पर यकीन कर ही नहीं सकते। तुम इस आदत के हाथों मजबूर हो चुके हो। जो तुम्हारे सामने है, यकीन करने लायक है, तुम उस पर भी शक करते हो। पहले मैं सोचती थी शायद तुम मुझे लेकर हद से ज्यादा ही पजेसिव हो, मगर मेरा सोचना गलत था। मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे अपने पवित्र रिश्ते पर कोई आँच आये। जब कोई लडकी गाँव से पढने शहर जाती है तो उसे कई उंच नीच का सामना करना पडता है। कई गंदे लोग जो अपने नापाक इरादों को अंजाम नहीं दे पाते वो तरह तरह कि बाते बनाते हैं, अब ये तुम्हारे ऊपर है कि तुम किस पर यकीन करते हो। मेरे एक दोस्त ने मुझे जन्मदिन का मेसेज भेजा उसी रोज से तुमने मेरा जीना दूभर कर दिया। जरा सोचो विपिन, कुछ इज्जत तो मेरे पिता की भी होगी। तुम्हारी नजर में किसी लडके को दोस्त बनाना सही नहीं, मगर साथ पढने वाले सभी लड़के गलत ही हों ये जरुरी तो नहीं। चलो छोड़ो, जब मैं तुम्हे पिछले दो सालों में ही यकीन नहीं दिला पायी तो अब कैसे दिला पाऊँगी।

13.4.12

इक रोज साँसों का समंदर रीत जाना है

6 टिप्पणियां


लिखा लकीरों का कभी मिटना नहीं,
है वो पत्थर जो कभी पिघलना नहीं,
क्या क्या  खोना है और क्या पाना है, 
पत्थर कोई दर्द बनकर रह जाना है
रूठे को मनाये  जमाने में रीत नहीं,
खुद से बढ़कर तेरा कोई मीत नहीं,
मिलना कुछ तो कुछ  छूट जाना  है,
बड़ा नाजुक है दिल कहीं टूट जाना है।
कुछ रिश्ते तो वक्त से भी टूटते नहीं,
आंसुओं से जख्म दिलों के भरते नहीं
जख्म गिनकर वक्त सारा बीत जाना है,
इक रोज साँसों का समंदर रीत जाना है

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