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26.11.10

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देखों, बादल आए हैं.......





देखों, बादल आए हैं,
बरस कर जलाने को,
भटक रहें, ढूंढते किसी को,
जान बूझ कर भिगोने को,
बेशक काले हैं,
मगर दिल से नहीं,
आदमी की तरह,
अहसान फरामोश नहीं,
जो रोज बटोरता है,
मगर बांटता कुछ नहीं,
किसी कवि कि तरह,
दिल में इनके भी,
टिकता कुछ नहीं,
आवारा हैं, 
शायद चल पड़े,
अभी तुम्हारे शहर को,
हो सके तो,
कुछ तुम्हारे बारे में,
इनको बताना,
जिस के सहारे,
कट जाये नीरस ज़िंदगी,
इनको बताना,
मुझे यकीन है,
ये फिर आएंगे, 
अगले साल,
तुम्हारे बारे में,
मुझे बता देंगे,
तुम्हारा दिया,
सब लौटा देंगे।


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मेरे बारे में...
रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
11 Comments
11 टिप्पणियां:
  1. .... बेशक काले है मगर दिल के नहीं ..... बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  2. आदमी की तरह एहसानफरामोश नहीं ...
    बेहरतीन प्रस्तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  3. @अरविन्द जांगिड जी ,
    आपको बहुत-बहुत धन्यवाद ,आपके मन में धुम्रपान त्यागने का विचार आना इस लेखन की सार्थकता को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है .निवेदन है कि जितनी जल्दी हो सके इस जहर को त्याग दें . आपको नए जीवन का एहसास होगा .आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मैंने 5000 से अधिक लोगों को नशापान से मुक्त कराया है . आप भी दृढ इच्छाशक्ति का परिचय दें . शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेशक काले हैं मगर दिल से नही-- तुम्हारी तरह। बहुत खूब। सही बात है इन्सान बस दूसरों से चाहता है मगर खुद किसी से कुछ बाँटता नही। अच्छी लगी रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रभावी रचना... बेहतरीन पंक्तियाँ.....

    उत्तर देंहटाएं
  6. ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई.........शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बादल के विषय में बड़ी गहराई से लिखी गयी रचना!
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  8. बादलों का स्वभाव तो धरती के दुख की आंच पा बरस जाना है, उसे दुख में तड़पता देख छोड़ जाना नहीं. दिल की गहराईयों को छूने वाली, गहन संवेदनाओं की बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  9. arvind ji.
    hausla afzai ka shukriya. koshish to karta hu ki jayada samay na lu par kya karu kabhi kabhi kalam ruth jati aur samay par kavitaye puri nahi ho pati. aage se dhyan rakhunga. ab baat aapki kavita ki. insaan to insaan hote hai. jis thali me khate hai usme chhed karna unki aadat hoti. insaan aur bhagwan ka mail kya. sunder rachna hai.

    उत्तर देंहटाएं

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