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5.12.10

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तेरे इस बेजान बाबू की नौकरी




रोज बात बात पर,
नई फाइल,
पुरानी को कोसती है,
पुरानी फाइल जिसकी,
गुम हुई पहचान,
अलमारी में भी,
मन ही मन,
अपना कसूर तलाशती है,
नयी रौब से कहती,
मैं, "रीक्र्यूट्मेंट" फाइल,
"सैलरी फाइल" की साली हूँ,
मुजसे डर क्योंकि,
मैं, रोज बड़े साहब से, 
मिलकर जो आती हूँ,
तू ठहरी पुरानी फाइल,
राज भाषा हिन्दी वाली,
बीत चला तेरा वक़्त,
"बापू" की तरह,
मुजमें गर्मी देख,
"हरे" की तरह,
तूने कभी कडक नोट पर,
क्या, बापू की मुस्कुराहट देखी है,
एक बात और,
तेरे उस बाबू से,
जिसकी गर्दन बंधी है,
रद्दी की टोकरी से,
जिंदगी रेंगती जिसकी,
बैंक के उधार से,
नौकरी उसकी बस,
मेरे साहब की कलम से,
मेरी शिकायत करने की,
भूल मत करना
वरना....................................,
मेरी पहुँच ऊपर तक,
तेरे इस बेजान बाबू की नौकरी,
मैंने बड़े सस्ते में जाते देखी है। 
◘◘◘


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मेरे बारे में...
रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
12 Comments
12 टिप्पणियां:
  1. अरविन्दजी ,फाइल के बहाने आपने भ्रष्टाचार पर तीखा कटाक्ष किया है, एक सशक्त रचना के लिये बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह, आपने बढ़िया लिखा है ... एक कसाव है लेखन में !

    उत्तर देंहटाएं
  3. और इन सबके बीच पिसता आम आदमी। अफसोसजनक!

    उत्तर देंहटाएं
  4. फाईलें अगर बोलती तो बिलकुल यही कहती ...
    दफ्तरी माहौल में भी कविता ने रंग जमाया है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बढ़िया व्यंग्य है और माध्यम भी आप ने बहुत सटीक लिया है
    बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  6. हकीकत परक रचना .....सटीक.... आखिरी पंक्तियाँ कमाल बन पड़ी हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. waah arvindji!
    bahut prbhavshali vyangy kavita...
    filon ke madhyam se kah di baaten khari-khari!

    उत्तर देंहटाएं

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