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24.2.11

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कोई धुँआ फिर दिल चीर कर निकला




पहचाना कोई अनजाना बन कर निकला
था कोई अपना जो आंसू बन कर निकला। 

एक वक़्त, वक़्त बेवक्त याद आता रहा,
बाकी वक्त जिंदगी का बीत कर निकला।

दिल में सजाये रखा एक ही अरमान,
दिल वो ही बेदर्दी से तोड़ कर निकला। 

कौन समझ पाया है रौशनी को यहाँ,
अँधेरा जिनका अंजाम बन कर निकला।

"सच" उठी हैं जो आज ये सर्द हवाएं,
कोई धुँआ फिर दिल चीर कर निकला। 

***   ***   ***

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मेरे बारे में...
रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
14 Comments
14 टिप्पणियां:
  1. 'सच' उठी हैं आज जो यह सर्द हवाएं ,
    कोई धुआं फिर दिल चीर कर निकला !
    लाजवाब शेर ,बेहतरीन ग़ज़ल.
    बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  2. ला-जवाब" जबर्दस्त!! शेर ,बेहतरीन ग़ज़ल.
    .....दिल से मुबारकबाद|

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच उठी है जो ये सर्द हवाए
    कोई दुआं फिर दिल चीर कर निकला
    ..............वह क्या बात है अरविन्द जी बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह व्बहुत सुन्दर... आपकी रचना कल चर्चा मंच पर होगी .. आपका आभार इस सुन्दर रचना के लिए...
    http://charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. arvindji, pichle kai dinose apka blog nhi khul pa rha hai comment krne se phle hi band ho jata hai apki rchnayen gugalreader par pdhin

    उत्तर देंहटाएं
  6. 'सच' उठी हैं जो आज ये सर्द हवाएं

    कोई धुआं फिर दिल चीरकर निकला

    उम्दा शेर

    उत्तर देंहटाएं
  7. लाज़वाब! बहुत सुन्दर गज़ल..

    उत्तर देंहटाएं
  8. अन्तिम पंक्तियां बहुत सुन्दर हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut khoob likha hai aapne
    Pehchana koi anjana ban ker nikla
    tha koi apna jo aanshu ban ker nikla "
    dil ko chu gayi aapki ye panktiyan

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छी ग़ज़ल की रचना की है आपने।
    पढ़कर काव्य का रसास्वादन किया।

    उत्तर देंहटाएं

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