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20.12.10

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ये हम कहाँ चले.......




पुरातन गवाहों से,
अमर प्यार को शापित कर,
मंदिर को मस्जिद से लड़ा चले, 
ये हम कहाँ चले। 

क्षेत्रवाद नहीं,
रास्ट्रवाद के नाम पर,
कितना खून मासूमों का,
यू ही हम बहा चले। 
ये हम कहाँ चले। 

ना बापू रहा,
ना उसके सिद्धांत,
उनको तो बेच हम,
अग्रेजी को खरीद चले,
ये हम कहाँ चले। 

जीवन बना,
सबका "निजी"
मदद को चिल्ला रहा कोई,
पड़ा सड़क पे,
आँख मीच हम चले
ये हम कहाँ चले। 

आए जहां से,
फिर वहीं जाना है,
बिना किसी पहचान के,
शायद ये हम भूल चले,
ये हम कहाँ चले।

(क्रमशः)

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मेरे बारे में...
रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
13 Comments
13 टिप्पणियां:
  1. आपकी चिन्ता ज़ायज़ है ! हमें नहीं मालूम कि हम किस भविष्य की ओर जा रहें हैं ! "गीता को कुरान से बु आती है, रम को रहीम से बु आती है ! अफ़सोस हम ऐसे समाज़ में रहते हैं जहां इन्सान को इन्सान से बु आती है !"

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी इस सुन्दर और सशक्त रचना की चर्चा
    आज के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/375.html

    उत्तर देंहटाएं
  3. पता नही कहाँ चले जा रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच ! दिशाहीन हमारी चेतना कहाँ जा रही है...
    सटीक अभिव्यक्ति!

    उत्तर देंहटाएं
  5. सच कहा ... कहाँ से आये कहाँ जाना है ... ये बात भूल जाते हैं हम ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. सार्थक चिंतन । अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

    उत्तर देंहटाएं
  7. सार्थक प्रश्न है...
    ये हम कहां चले...
    चिंतन करने को विवश करती प्रशंसनीय रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. आत्म मंथन करने का प्रयास ...अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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