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साथ अँधेरों का निभाना बहुत था




साथ अँधेरों का निभाना बहुत था,
टूटे ख्वाबों को सजाना बहुत था। 

कैद- ए-गम- ए- दिल में ही रहे,
यूं तो ज़िंदगी में वक़्त बहुत था। 

दिल-ए-नादां अब बहलता नहीं,
इसे हमने ही बहकाया बहुत था।

एक ख्वाब जो गुम हुआ कहीं,
जब मिला तो अजनबी बहुत था। 

हो गया परिंदा लकीरों के हवाले,
याद नसीब ने उसे रखा बहुत था। 

जहन में उठते हैं जो कई सवाल,
जवाब होता तो एक ही बहुत था। 

"सच" उठता रहा जो धुआँ हर बार,
अश्कों की नमी में वो गीला बहुत था। 

***  ***   ***

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रहने वाला : सीकर, राजस्थान, काम..बाबूगिरी.....बातें लिखता हूँ दिल की....ब्लॉग हैं कहानी घर और अरविन्द जांगिड कुछ ब्लॉग डिजाईन का काम आता है Mast Tips और Mast Blog Tips आप मुझसे यहाँ भी मिल सकते हैं Facebook या Twitter . कुछ और

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Comments
21 Comments
21 टिप्पणियां:
  1. हो गया परिंदा लकीरों के हवाले,
    याद नसीब ने उसे रखा बहुत था।

    बहुत खूब ..बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. अश्कों नमी में वो गीला बहुत था ...कभी कभी सत्य भी इतना मजबूर हो जाता है । बेहतरीन अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. एक उम्दा गज़ल। शुभकामनाएॅ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हो गया परिंदा लकीरों के हवाले,
    याद नसीब ने उसे रखा बहुत था।

    बेहतरीन गज़ल....

    उत्तर देंहटाएं
  5. यह दौर भी कम हसीन नहीं होता.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत उम्दा!
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  7. गजल का हर शेर उम्दा है ! आभार ! बिल्कुल सही कहा है आपने सवाल हजारों हो पर जवाब एक ही बहुत है !

    उत्तर देंहटाएं
  8. जहन में उठते हैं जो कई सवाल

    जवाब होता तो एक ही बहुत था

    अच्छा शेर

    उत्तर देंहटाएं
  9. ख़्वाब गुम हो जाते हैं और जब दुबारा मिलते हैं तो अजनबी जैसे लगते हैं।
    बढ़िया ग़ज़ल।

    उत्तर देंहटाएं
  10. वह कमाल की ग़ज़ल है साहब ... दुनियादारी नज़र आती है हर शेर में ... लाजवाब ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. एक ख्‍वाब जो गुम हुआ कभी

    जब मि‍ला तो अजनबी बहुत था....
    अर्थवान पंक्‍ि‍तयां हैं..बधाई कि‍ आपको सूझीं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. जहन में उठते हैं जो कई सवाल
    जवाब होता तो एक ही बहुत था

    बहुत खूब ....!!

    उत्तर देंहटाएं

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